इंसानियत को चाहिए कश्मीरियत’

-विभूषण, वरिष्ठ साहित्यकार

बीते पांच अगस्त को केंद्र की राजग सरकार ने जो कुछ बड़े ऐतिहासिक फैसले लिये हैं, अनुच्छेद 370 एवं 35ए की समाप्ति, लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाना, जम्मू-कश्मीर को दिल्ली की तरह एक केंद्र शासित प्रदेश बनाना, वह अप्रत्याशित लग सकता है, पर है नहीं. इस फैसले को कुछ लोग ‘फाइनल सॉल्यूशन’ (अंतिम समाधान) कह रहे हैं, वे सब एक बड़ी गलती कर रहे हैं.

नाजियों ने द्वितीय विश्व युद्ध में जनवरी, 1942 में ‘फाइनल सॉल्यूशन’ का इस्तेमाल अपनी योजना के संदर्भ में किया था. उनकी भाषा व्यंजनापूर्ण होती थी. जनवरी 1942 में नाजी नेतृत्व ने बर्लिन के नजदीक वानेसा सम्मेलन में इसका प्रयोग किया था, जिसका संबंध यहूदियों के सफाये से है. इसलिए इस पद का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि इसका अपना एक इतिहास-संदर्भ है.

जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत में विलय का एक इतिहास है. यह अन्य रियासतों की तरह भारत में सम्मिलित नहीं हुआ था. 15 अगस्त, 1947 को कश्मीर आजाद था. तीन सप्ताह पहले माउंटबेटन ने ‘चैंबर ऑफ प्रिंसेज’ को अपने संबोधन में कहा था कि वे भारत या पाकिस्तान में से किसी एक का चयन कर लें. इसी समय उन्होंने ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ के उपयोग की जरूरत बतायी थी. विभाजन के समय रियासतों को उन्होंने ‘बिना पतवार की नाव’ कहा था.

उनके इस संबोधन के बाद ही सभी राजाओं और नवाबों ने विलय की संधि पर हस्ताक्षर किये थे. कश्मीर के महाराजा हरि सिंह अपनी रियासत को आजाद रखने के पक्ष में थे. कश्मीर को ‘पूर्व का स्विट्जरलैंड’ बनाने का उनका स्वप्न था. जूनागढ़ से कश्मीर की तुलना गलत है. जूनागढ़ की जनता ने रायशुमारी के बाद भारत में रहने का फैसला किया था.

कश्मीर में ऐसा नहीं हुआ. कश्मीर को लेकर आरंभ में नेहरू और पटेल के विचार समान नहीं थे. नेहरू कश्मीर के भारत में विलय के पक्ष में थे और पटेल कश्मीर के पाकिस्तान में विलय के विरुद्ध नहीं थे. जूनागढ़ हिंदू बहुुल मुस्लिम शासित राज्य था और कश्मीर मुस्लिम बहुल हिंदू रियासत थी.

रायशुमारी के बाद जूनागढ़ का विलय भारत में हुआ. कश्मीर में रायशुमारी नहीं हुई और भारत में उसका विलय हुआ. पाकिस्तान के कबायिली हमले को झेलने में असमर्थ राजा हरि सिंह ने 26 अक्तूबर, 1947 को ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ पर हस्ताक्षर किया. कश्मीर की जनता की रजामंदी के बिना कश्मीर का भारत में बने रहना संभव नहीं था. यही वे हालात थे, जिससे कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला और 370 लागू हुआ.

यह मान कर चलना गलत है कि कई मामलों में कश्मीर गुजरात से बेहतर रहा है. प्रति व्यक्ति औसत आयु, कुपोषण और गरीबी, बच्चों की मृत्यु दर, महिला जन्मदर, लड़कियों की शिक्षा आदि में. ज्यां द्रेज ने एक रैली में हाथ में रखे एक प्लेकार्ड में नौ संकेतों की तुलना कश्मीर और गुजरात से की है. आंकड़े बताते हैं कि अनेक अर्थों में कश्मीर गुजरात से बेहतर है. यह बेहतरी 370 और 35ए के बिना संभव नहीं थी.

कश्मीर की जनता में ही नहीं, भारत में भी कई प्रकार की आशंकाएं हैं. अमरनाथ यात्रा के दौरान आतंकवादी हमले की आशंका बताकर कश्मीर में और अधिक अर्द्धसैनिक बल भेजे गये हैं और संचार-संपर्क के सभी साधन बंद कर दिये गये. सरकार की मंशा दूसरी थी. कश्मीर अब राज्य नहीं है, केंद्र शासित प्रदेश है.

अब सरकार के ऊपर है कि वह उन सभी आशंकाओं को दूर करे, जो कश्मीर में ही नहीं, पूरे देश में मंडरा रही हैं. सरकार ने जो नया ‘नैरेटिव’ रचा है, उसे व्यापक अर्थों में भी देखा जा रहा है. कहा जा रहा है कि देश की जो अर्थव्यवस्था बिगड़ी हुई है और ऑटोमोबाइल सेक्टर में जो भारी नुकसान हुआ है, इससे सबका ध्यान मोड़ा गया है. आशंकाओं से इनकार भी नहीं किया जा सकता. नोटबंदी के बाद आतंकवाद नहीं घटा.

क्या इस फैसले के बाद आतंकवाद समाप्त हो जायेगा? अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद तालिबानों की अधिक सक्रिय होने की बातें भी हो रही हैं, जिसका भारत पर प्रभाव पड़ेगा. कश्मीर को उत्तरी कोरिया, फिलिस्तीन, पूर्वी तिमूर और दिक्षणी सुडान से जोड़कर देखा जा रहा है. अन्य राज्यों में भी विभाजन की बाद में ही संभावनाएं हैं.

वाजपेयी के त्रिक- ‘इंसानियत, जम्हूरियत, कश्मीरियत’ की बात कही जा रही है कि अब कश्मीर में इन तीनों में से कुछ भी नहीं रहेगा. आशंकाएं आशंकाएं हैं और ये सच नहीं हों, यह सरकार पर निर्भर है. भारत अब पहले से भिन्न है. अब यह एक ‘बहुसंख्यक राज्य’ है. मात्र तीन महीने पहले (22 अप्रैल, 2019) हार्पर कॉलिन्स से प्रकाशित पुस्तक का नाम है- ‘मेजोरिटेरियन स्टेट : हाउ हिंदू नेशनलिज्म इज चेंजिंग इंडिया’.

प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, अटलजी और आंबेडकर के स्वप्न के पूरे होने की बात कही है. मुखर्जी भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे और हिंदू राष्ट्र के समर्थक थे. ये कश्मीर ‘लीगेसी’ के पहले व्यक्ति थे. उनका एक प्रसिद्ध स्लोगन था- ‘एक देश में दो विधान/ एक देश में दो निशान/ एक देश में दो प्रधान/ नहीं चाहिए, नहीं चाहिए.

‘ अब आशंका यह भी है कि एक देश का अर्थ कहीं ‘हिंदू राष्ट्र’ तो नहीं है? कश्मीर आशंकाओं के बीच है. बाहर भी आशंकाएं हैं. दुनियाभर के निवेशकों को कश्मीर में निवेश के लिए आमंत्रित किया जा रहा है. बड़ा सवाल ‘कश्मीरियत’ को बचाये रखने का है, जो बिना इंसानियत और जम्हूरियत के संभव नहीं है.

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