संसद को संबोधित करने की परंपरा 400 साल से ज्यादा पुरानी, संविधान में व्यवस्था, इसलिए राष्ट्रपति का अभिभाषण जरूरी

  • संसद को संबोधित करने की परंपरा ब्रिटेन से आई है, ब्रिटेन में 16वीं सदी में वहां के राजा या रानी संसद को संबोधित करते थे
  • संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप बताते हैं- ब्रिटेन में पहले किंग या क्वीन सेशन बुलाने का कारण बताते थे, बाद में भाषण में सरकार की उपलब्धियां, नीतियां भी बताई जाने लगीं
  • भारत में 1921 से सदन को संबोधित किया जा रहा है, आजादी से पहले वायसराय या गवर्नर जनरल सदन को संबोधित करते थे, 1950 से राष्ट्रपति अभिभाषण देने लगे
  • संविधान के आर्टिकल 87 (1) में राष्ट्रपति के अभिभाषण देने का प्रावधान है, इस आर्टिकल के तहत राष्ट्रपति संसद के किसी एक सदन या दोनों सदनों को संबोधित कर सकते हैं

नई दिल्ली. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 31 जनवरी को संसद के बजट सत्र में अभिभाषण दिया था। इसके बाद तीन-चार दिनों से चल रही धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को जवाब दिया। लेकिन राष्ट्रपति के अभिभाषण की जरूरत क्यों पड़ी? क्या इसके बिना संसद का सत्र शुरू नहीं हो सकता? तो इसका जवाब जानने के लिए थोड़ा इतिहास में जाना पड़ेगा। दरअसल, सदन को संबोधित करने की परंपरा भारतीय नहीं, बल्कि ब्रिटिश है। ब्रिटिश पार्लियामेंट की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, सदन को संबोधित करने की परंपरा 16वीं सदी से भी ज्यादा पुरानी है। उस वक्त वहां के राजा या रानी सदन को संबोधित करती थीं। लेकिन, 1852 के बाद से हर साल ब्रिटेन में सदन को वहां के किंग या क्वीन संबोधित करती आ रहीं हैं। यही सिस्टम अंग्रेजों के जरिए भारत में भी आया। 1919 में भारत में ब्रिटिश सरकार ने भारत सरकार अधिनियम पास किया।

1919 में ही हमारे यहां राज्यसभा का गठन हुआ, लेकिन उसे उस समय ‘काउंसिल ऑफ स्टेट’ कहा जाता था। हालांकि, लोकसभा का इतिहास 1853 से शुरू होता है। शुरुआत में लोकसभा को ‘लेजिस्लेटिव काउंसिल’ थी, जिसमें 12 सदस्य थे। आजादी के बाद 1950 से सत्र शुरू होने से पहले राष्ट्रपति का अभिभाषण होता है। संविधान के आर्टिकल 86(1) में इसका प्रावधान है। इसके तहत आम चुनावों के बाद के पहले और साल के पहले सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से ही होता है और उसके बाद दोनों सदनों का काम शुरू होता है।

हमारे संविधान में 10 देशों से बातें ली गईं, इसलिए राष्ट्रपति अभिभाषण की परंपरा भी आ गई

15 अगस्त 1947 में आजादी मिलने के बाद संविधान सभा का गठन हुआ, जिसके अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर थे। 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा में संविधान पारित और 26 जनवरी 1950 संविधान लागू हुआ। हमारे देश के संविधान में 10 देशों के संविधान से मिलकर तैयार हुआ है। इन देशों में से कुछ न कुछ बातें हमारी संविधान में जोड़ी गईं। हमारी संसदीय प्रणाली ब्रिटेन से ही ली गई। इसलिए आज भी बहुत सारी संसदीय परंपराएं, जो ब्रिटेन में चलती हैं, वही हमारे यहां भी हैं। क्योंकि ब्रिटेन में सत्र की शुरुआत से पहले उसे किंग या क्वीन संबोधित करती थीं, इसलिए भारत में भी ऐसा ही होने लगा। इसके लिए संविधान में व्यवस्था की गई।

ब्रिटिश राजघराने को पैसे की जरूरत होती थी, तो सदन की बैठक बुलाते थे, इसे बुलाने का कारण ही बताते थे

ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली में राजपरिवार का प्रमुख भारतीय संसदीय प्रणाली के राष्ट्रपति के बराबर होता है। ब्रिटेन में वहां के किंग या क्वीन को राष्ट्रप्रमुख का दर्जा दिया गया है। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप बताते हैं, ‘‘संसद सत्र शुरू होने से पहले राष्ट्रपति के अभिभाषण की परंपरा ब्रिटेन से ही आई है। ब्रिटिश सिस्टम में किंग या क्वीन के भाषण को “कॉजेस ऑफ समन’ कहा जाता था। इसमें सत्र या सेशन बुलाने का कारण बताया जाता था। पहले जब भी राजघराने को पैसे की जरूरत होती थी, तब वह सदन की बैठक बुलाते थे और इस बैठक को बुलाने का कारण बताते थे। लेकिन धीरे-धीरे सरकार अपनी नीतियां, कार्यक्रम और उपलब्धियां भी बताने लगी क्योंकि किंग या क्वीन का भाषण सरकार ही तैयार करती थी। भारत में भी ऐसा ही होता है।’’

वे बताते हैं, ‘‘ब्रिटिश इंडिया के समय जब भारत में संवैधानिक संशोधन होने लगे तो यहां पर भी किंग/क्वीन की जगह गवर्नर जनरल या वायसराय सदन में भाषण देते थे। उसके बाद हमारे संविधान में भी इसे जोड़ा गया।’’ यही बात लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी अचारी भी कहते हैं। अचारी बताते हैं कि ब्रिटेन में क्वीन सदन को सरकार के कामकाज के बारे में बताती थीं और उसी परंपरा को हमने भी अपनाया।

पहले हर सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से ही होती थी, बाद में साल के पहले सत्र में होने लगा उनका भाषण

राष्ट्रपति का अभिभाषण संवैधानिक जरूरत है क्योंकि उनके अभिभाषण के बिना सत्र शुरू नहीं हो सकता। संसद के दोनों सदनों में सालभर में तीन सत्र होते हैं। पहला- बजट सत्र, दूसरा- मानसून सत्र और तीसरा- शीतकालीन सत्र। साल में सबसे पहले बजट सत्र होता है। इसलिए राष्ट्रपति इसी सत्र में दोनों सदनों को संबोधित करते हैं। लेकिन पहले ऐसा नहीं होता था। सुभाष कश्यप बताते हैं कि आजादी के बाद 1950 में जब संविधान लागू हुआ तो राष्ट्रपति को हर सत्र को संबोधित करना होता था, लेकिन बाद में इसमें संशोधन हुआ। जिसके बाद राष्ट्रपति आम चुनाव के बाद के पहले सत्र और साल के पहले सत्र को ही संबोधित करने लगे।

राष्ट्रपति का अभिभाषण जरूरी क्यों है?

  • इस सवाल पर पीडीटी अचारी कहते हैं “संसद को इस बात को जानने का अधिकार है कि सरकार क्या कर रही है और क्या करने वाली है। इसलिए राष्ट्रपति संसद को संबोधित करते हैं और उसे सरकार की नीतियों और कामकाज के बारे में बताते हैं, क्योंकि राष्ट्रपति भी संसद का ही हिस्सा हैं।’ वे कहते हैं कि राष्ट्रपति का अभिभाषण सरकार ही तैयार करती है, जिसमें सरकार के अगले एक साल के कामकाज का ब्यौरा रहता है।
  • संविधान के आर्टिकल 86 (1) और 87 (1) में राष्ट्रपति को संसद को संबोधित करने की शक्ति है
    संसद के किसी एक सदन या एक साथ दोनों सदनों के सामने राष्ट्रपति के अभिभाषण का प्रावधान संविधान में किया गया है। इसका प्रावधान भारत सरकार अधिनियम,1919 में किया गया था और 1921 से यह चला आ रहा है। राष्ट्रपति जो अभिभाषण देते हैं, वह सरकार ही तैयार करती है। संविधान के आर्टिकल 86 (1) में राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वे जब चाहें तब संसद के किसी एक सदन या दोनों सदनों में अभिभाषण दे सकते हैं और इसके लिए सदस्यों को बुला सकते हैं। हालांकि, आजतक इस आर्टिकल का इस्तेमाल नहीं हुआ है। संविधान के आर्टिकल 87 (1) में यह प्रावधान है कि आम चुनाव के बाद पहले सत्र और हर साल के पहले सत्र में संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रपति अभिभाषण देंगे।

आम चुनाव के बाद सांसदों की शपथ और लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव के बाद ही होता है अभिभाषण

आर्टिकल 87 (1) के तहत राष्ट्रपति का अभिभाषण नियमित रूप से होता है। लोकसभा चुनावों के बाद हर सांसद की शपथ के बाद और लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव के बाद ही राष्ट्रपति का अभिभाषण होता है। शपथ और लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव में आमतौर पर दो दिन का समय ही लगता है। जब तक राष्ट्रपति दोनों सदनों में अभिभाषण नहीं दे देते, तब तक कोई अन्य कार्य नहीं किया जा सकता। वहीं, हर साल के पहले सत्र के पहले दिन ही राष्ट्रपति दोनों सदनों में अभिभाषण देते हैं।

राष्ट्रपति के अभिभाषण से लेकर प्रधानमंत्री के जवाब तक क्या है प्रक्रिया?

  • राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद इस पर चर्चा होती है। इस चर्चा के लिए समय दोनों सदनों के अध्यक्ष ही तय करते हैं। लोकसभा के नियम 16 और राज्यसभा के नियम 14 के मुताबिक, अध्यक्ष सदन के नेता या प्रधानमंत्री से राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा का समय तय करेगा। इसके बाद लोकसभा के नियम 17 के तहत, सदन का कोई सदस्य धन्यवाद प्रस्ताव पेश करता है, जिसका अनुमोदन कोई दूसरा सदस्य करता है। इसके बाद धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा होती है। सांसद धन्यवाद प्रस्ताव में संशोधन की मांग भी कर सकते हैं। यह संशोधन उन विषयों के बारे में दिए जाते हैं, जिनका जिक्र राष्ट्रपति के अभिभाषण में किया गया हो या ऐसे विषयों पर भी दे सकते हैं जिनका जिक्र अभिभाषण में किया जाना चाहिए था।
  • लोकसभा के नियम 20(1) और राज्यसभा के नियम 18 के तहत, धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब देने का अधिकार सरकार के पास है। प्रधानमंत्री चाहें तो खुद या सरकार की तरफ से कोई मंत्री चर्चा के बाद जवाब दे सकता है। भले ही वे चर्चा के दौरान सदन में मौजूद रहे हों या न रहे हों। प्रधानमंत्री या किसी मंत्री की तरफ से सरकार का जवाब दिए जाने के बाद सदन के अन्य सदस्य को उत्तर देने का अधिकार नहीं होता।

क्या कोई सदस्य राष्ट्रपति के अभिभाषण पर सवाल भी उठा सकता है?

दोनों सदनों के किसी भी सदस्य को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं है। लेकिन, धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सदस्य बहस कर सकते हैं। लेकिन इस दौरान भी सदस्य ऐसे विषय नहीं उठा सकते, जिसका सीधा संबंध सरकार से नहीं है। इसके साथ ही बहस के दौरान राष्ट्रपति का नाम भी नहीं ले सकते क्योंकि अभिभाषण का प्रस्ताव सरकार तैयार करती है।

(सोर्स : लोकसभा और राज्यसभा)

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