पीडि़त और दोषी में से किसको मिल रहा न्याय!

शिव दयाल मिश्रा
कानून पीडि़त को न्याय दिलाने के लिए बनाया जाता है। मगर कानून ही कानून की धज्जियां उड़ाता रहता है।चर्चा में आता है कि राजतंत्र में पीडि़त को न्याय मिलने में इस कदर देरी नहीं होती थी जिस तरह आज देखने को मिल रही है। हो सकता है उस समय व्यवस्था में अपवाद स्वरूप गलतियां भी होती होंगी। फिर भी पीडि़त को न्याय मिलने में इतना विलंब तो कदापि नहीं होता था। साक्ष्य भी इस तरह से जुटाए जाते थे कि अपराधी स्वयं ही अपराध स्वीकार कर लिया करता था। आज पीडि़त को न्याय दिलाने के लिए दुनिया भर के कानून बने हुए हैं, मगर एक कानून दूसरे की काट बन जाता है। न्याय के इंतजार में दूसरे पक्ष के वकील के तर्कों के आगे पीडि़त हाथ मलता ही रह जाता है और फिर लगाते हैं न्याय के लिए कोर्ट कचहरियों के चक्कर। इसका जीता-जागता नमूना सबके सामने है निर्भया कांड के बलात्कारियों का। निर्भया कांड के दोषियों को फांसी की सजा एक मजाक बन गई है। कितनी ही बार फांसी की तारीख तय हो गई। मगर, तर्क कहें या कानूनों का लचीलापन। हर बार कोर्ट के वारंट धरे रह जाते हैं। फिर कोई नया दांव चल दिया जाता है जिससे अपराधी फांसी के फंदे तक पहुंचने से बच जाते हैं। अभी तक तो यही कहा और सुना जाता रहा है कि कोर्ट के चक्कर और तारीख पर तारीख। मगर अब तो स्थिति यह हो गई है कि फांसी की तारीख तय होने के बाद भी फांसी को कानून चकमा दिए जा रहा है। अब तो ऐसा लगने लगा है कि इन दुष्कर्मियों को फांसी होगी भी या नहीं। दूसरी तरफ ऐसे भी मामले सामने आए हैं जिनमें दुष्कर्म की शिकार हुई महिलाओं को सरकार की तरफ से मुआवजा राशि दे दी गई। मगर बाद में मुकद्दमे का फैसला आने से पहले ही पीडि़ता अपने बयानों से मुकर जाती है और पीडि़त भी बच जाता है और मुआवजा भी ले लिया जाता है। अब इसे क्या कहा जाएगा। न्याय या अन्याय। हमारे संविधान में कानूनों की कमी नहीं है। दुनिया भर के कानून बने हुए हैं। मगर उनकी पालना नहीं होती और वही कानून एक-दूसरे कानून की काट कर देता है और अपराधी बचता रहता है। अब बताइये किसे मिल रहा है न्याय। दोषी को या पीडि़त को।
shivdayalmishra@gmail.com

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