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शिव दयाल मिश्रा
महाभारत में भीषण युद्ध चल रहा था द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए चक्रब्यूह की रचना कर डाली। उस समय चक्रब्यूह को तोडऩे की विद्या सिर्फ अर्जुन में थी, जिसे रणनीति के तहत सात्यकी युद्ध करते हुए दूर ले गया और पीछे से महारथियों की भीड़ ने अर्जुन को घेर लिया और घेर कर प्रहार करते रहे आखिर अभिमन्यु मारा गया। तो इस समय कोरोना महामारी के प्रहार से घायल जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। अपने अस्तित्व को बचाने में लगी हुई है। दूसरी तरफ सरकार आए राहत देने के बजाए कई तरह के टैक्स वसूल रही है। पानी-बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए भी जनता से वसूले जाने वाले शुल्क में बढ़ोतरी कर दी गई है। कोरोना के साथ ही एक तरफ तो महंगाई और बेरोजगारी की मार दूसरी तरफ प्रदेश में विद्युत उपभोक्ताओं से बिजली कंपनियां फ्यूल चार्ज के नाम पर 30 पैसे प्रति यूनिट और वसूलने फरमान। (भले ही अब इसे वापस लेने की खबरें आ रही हों) वो एक अलग बात है। जबकि कुछ दिन पूर्व ही सरकार ने बिजली बिलों में करंट लगाया ही था। किससे कहे जनता। सरकार संवेदनाहीन है उसे जनता की कोई परवाह नहीं है। जो नुमाइंदे जनता ने विधानसभा में भेजे थे वे अपनी जुगत लगाने में व्यस्त रहते हैं। उन्हें अगले चुनाव की जुगत से ही फुर्सत नहीं है। जनता की कहां सुनने और समझने वाले हैं। विपक्ष भी मृतप्राय: ही दिखाई दे रहा है। एक जमाना था, जब सरकार 10 पैसे बढ़ाने से पहले भी दस बार सोचती थी। और अगर विपक्ष को विश्वास में लिए बिना किसी भी तरह की महंगाई बढ़ोतरी कर देती थी, तो विपक्ष भारी जनबल के साथ सड़क पर उतर जाता था। मगर उन आंदोलनों के दिन तो अब लद गए हैं। अब तो सरकार बचाने के लिए या फिर स्वयं के लिए पार्टी आंदोलन होते हैं। जनता के हित में कोई आंदोलन देखे मुद्दतें बीत गई हैं। वरना ये कोई बात होती है क्या आए दिन जब देखो तब बिना सोचे समझे सिर्फ सरकार और उसके विभाग अपनी घाटा पूर्ति के लिए जनता पर टैक्स ठोकते रहते हैं। जनता तो भेड़ है उसकी पीठ पर कोई ऊन क्यों छोड़ेगा। मगर ऊन भी तो हो अब तो चमड़ी ही उधेड़ी जा रही है। क्या किया जाए। अभिमन्यु को कोई बचाने नहीं आया और मरे हुए अभिमन्यु पर भी महारथी वार करते रहे। मगर यह जनता मरेगी तो नहीं। मगर, दर्द से कराहती तो है ही।
shivdayalmishra@gmail.com

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