गरीबी का लेबल लगना गरीबी उन्मूलन में बाधक!

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गरीब शब्द ही अपने आप में एक अभिशाप है। गरीब और गरीबी दोनों ही अपने आप में विरोधाभासी शब्द हैं। पहले यह शब्द मात्र एक ब्राह्मण के लिए इस्तेमाल होता था। हमेशा कथा और कहानियों में सुनने और बढऩे में आता है कि एक गरीब ब्राह्मण था। कभी दूसरी जाति के लिए गरीब शब्द का इस्तेमाल नहीं होता था।

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शिव दयाल मिश्रा
गरीब
शब्द ही अपने आप में एक अभिशाप है। गरीब और गरीबी दोनों ही अपने आप में विरोधाभासी शब्द हैं। पहले यह शब्द मात्र एक ब्राह्मण के लिए इस्तेमाल होता था। हमेशा कथा और कहानियों में सुनने और बढऩे में आता है कि एक गरीब ब्राह्मण था। कभी दूसरी जाति के लिए गरीब शब्द का इस्तेमाल नहीं होता था। गरीब ब्राह्मण सुदामा की कथा सर्वविदित है। एक तरफ गरीब ब्राह्मण सुदामा और दूसरी तरफ उनके मित्र द्वारका के राजा श्रीकृष्ण थे। जिन्होंने पता चलते ही अपने मित्र सुदामा की गरीबी मिटा दी थी। मगर आजकल गरीबी और गरीब दोनों का ही विभिन्न वर्गों में विस्तार हो गया है और वे राजनीति के हथियार बन गए हैं। राजनीति तो राजनीति, मगर अब तो समाजसेवक और एनजीओ संचालकों के लिए गरीब और गरीबों की बस्ती कार्यक्षेत्र बन गए हैं। इन दिनों कंबल और सर्दी के कपड़े उन्हीं बस्तियों में जाकर बांटे जा रहे हैं जहां हमेशा बांटते रहे हैं। वर्तमान में गरीबी एक लेबल बन गया है जिसका दायरा बढ़ता ही जा रहा है। क्योंकि आज की व्यवस्थाओं में जिसको मिटाने की बात की जाती है वह उतनी ही गति से बढ़ जाती है। उदाहरण के लिए जंगल को बचाने की बात होती है तो जंगल साफ हो रहे हैं। भ्रष्टाचार को मिटाने की बात होती है तो भ्रष्टाचार नए-नए तरीकों से सामने आ जाता है। यहां तक कि पिछले दिनों भ्रष्टाचार को मिटाने वाले ही भ्रष्टाचार में अंदर हो गए। कहने का तात्पर्य है कि जिस किसी को भी मिटाने की बात करते हैं वही उभर कर ज्यादा सामने आ जाते हैं। बात गरीबी की कर रहे थे तो आदमी का नजरिया गरीब उसको मानता है जिसके पास प्रत्यक्ष रूप से खाने पीने या पहनने की व्यवस्था नहीं होती है। समाजसेवक और एनजीओ चलाने वाले उन्हीं गिनी-चुनी बस्तियों में सर्दी के कपड़े या खाने-पीने का सामान या और किसी तरह की सहायता लेकर पहुंच जाते हैं। वर्षों से उन्हीं जगहों और उन्हीं लोगों को सहायता मिलती रहती है। मगर गरीबी मिटने का नाम ही नहीं ले रही है। कुछ ऐसे गरीब भी हैं जो दिखने में तो अप-टू-डेट दिखते हैं मगर उनकी अंदर से हालत बड़ी पतली होती है। ऐसे लोग अपने आपकी पीड़ा किसी को कह भी नहीं सकते और सह भी नहीं पा रहे हैं। ऐसे लोगों को चिन्हित कर जब तक उनकी सहायता नहीं की जाती। गरीबी नहीं मिट सकती। दूसरा जिनको फ्री का खाने की आदत हो जाती है उनकी गरीबी भी नहीं मिट सकती। संकल्प के साथ मेहनत करने वाले कभी गरीब नहीं होते। इसलिए असहाय लोगों की सहायता करनी चाहिए।

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