शिव दयाल मिश्रा‘नमस्ते संस्कृत का शब्द है जिसका संधि विच्छेद ‘नम: तेÓ होता है। जिसका तात्पर्य नमन करना है। ये तो हुआ नमस्ते का अर्थ। जब नमस्ते की शारीरिक क्रिया को देखते हैं तो दोनों हाथों को जोडऩा पड़ता है। यानि की किसी को अभिवादन करने के लिए हम उसके समक्ष दोनों हाथ जोड़कर सिर को झुकाते हैं। जिसके जवाब में सामने वाला भी उसी प्रकार नमस्ते करते हुए अपने अभिवादन का जवाब देता है। हमारी संस्कृति अर्थात भारतीय संस्कृति की एक-एक क्रिया और व्यवस्था मनुष्य के शरीर और समाज के प्रत्येक प्राणी को स्वस्थ और शांति से जीवन व्यतीत […]

शिव दयाल मिश्राकानून पीडि़त को न्याय दिलाने के लिए बनाया जाता है। मगर कानून ही कानून की धज्जियां उड़ाता रहता है।चर्चा में आता है कि राजतंत्र में पीडि़त को न्याय मिलने में इस कदर देरी नहीं होती थी जिस तरह आज देखने को मिल रही है। हो सकता है उस समय व्यवस्था में अपवाद स्वरूप गलतियां भी होती होंगी। फिर भी पीडि़त को न्याय मिलने में इतना विलंब तो कदापि नहीं होता था। साक्ष्य भी इस तरह से जुटाए जाते थे कि अपराधी स्वयं ही अपराध स्वीकार कर लिया करता था। आज पीडि़त को न्याय दिलाने के लिए दुनिया भर […]

शिव दयाल मिश्राजब किसी के घर में शिशु का जन्म होता है तो बड़ी ही खुशी होती है और पूरे घर में एक प्रकार का आनन्दोत्सव मनाया जाता है। ठीक इसी प्रकार 5 वर्ष पूर्व जागरूक जनता नाम के समाचार पत्र का जन्म हुआ। जिस प्रकार बच्चे के जन्म से पूर्व जो उधेड़बुन परिजनों के दिमाग में चलती है ठीक वैसे ही इस अखबार के प्रकाशन की उधेड़बुन दिमाग में चली। लग रहा था कि कैसे चलेगा। कहां से व्यवस्था होगी। क्योंकि किसी भी कार्य को आगे बढ़ाने के लिए आर्थिक व्यवस्था पहले देखनी होती है। मगर ईश्वर का नाम […]

शिव दयाल मिश्रा आम लोगों में अपनी प्रशंसा और नाम की भूख प्रकृति प्रदत्त होती है। कई बार आपस में बातचीत के दौरान कहा और सुना जाता है कि हमें प्रशंसा की भूख नहीं है। हमें नाम कमाने की भूख नहीं है। मगर यह बिल्कुल असत्य है। क्योंकि दुनिया में ऐसी कोई चीज नहीं है जिसका नाम न हो। और अगर नाम है तो, या तो वह प्रसिद्ध है या फिर बदनाम है। शहरों में गलियों, बाजारों और चौक, तिराहों को भी नाम से पहचाना जाता है। अब सोचने की बात यह है कि इन चौराहों या बाजारों का नाम […]

शिव दयाल मिश्रा प्रकृति से छेड़छाड़ करने के बाद होने वाले नुकसान की बातें बहुत दिनों से सुनने में आ रही है। सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर प्रकृति से छेड़छाड़ को रोकने के बारे में बहुत से अभियान भी चलाए जा रहे हैं। मगर, आदमी है कि ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पातÓ वाली कहावत को चरितार्थ कर ही देता है। वनस्पति और जंगलों से होने वाली छेड़छाड़ और प्रकृति के दोहन के बाद अब तो आदमी का जीवन भी सिजेरियन ऑपरेशन से होता हुआ वेंटीलेटर पर पहुंचने लगा है और उसके बाद फिर अपने अंतिम गंतव्य को प्राप्त होता है। […]

शिव दयाल मिश्रा आजकल मनुष्य अपने आप में सिमट गया है या व्यस्त हो गया है या आलसी हो गया है या वह किसी सामाजिक काम को बोझ समझकर अनिच्छा से करने लगा है। यूं तो हम कह सकते हैं कि इस भागमभाग की जिंदगी में आदमी को अपने घर-गृहस्थी के काम और अपनी जीविकोपार्जन के लिए व्यस्त रहते हुए सामाजिक सरोकारों के लिए समय निकालना बड़ा मुश्किल सा हो गया है। मगर कुछ ऐसा भी देखने में और सुनने में आता है कि जिन लोगों के पास कोई काम नहीं होता है तब भी वे यही कहते हैं कि […]

– शिव दयाल मिश्रा स्कूलों में छात्र-छात्राओं की कुछ समय बाद परीक्षाएं प्रारंभ होने वाली है। सारे छात्र-छात्राएं और उनके अभिभावक छात्रों के अच्छे परिणाम के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। कहीं एक्स्ट्रा कक्षाएं तो कहीं ट्यूशन तो कहीं घर पर उनके अभिभावक उनकी परीक्षाओं की तैयारियां करवा रहे हैं। अब कोर्स की बात करें तो कोर्स कोई घुट्टी तो है नहीं, जिसे घोंट कर पिला दिया जाए। उसके लिए तो नियमित अध्ययन करने की जरूरत होती है। अक्सर देखा जाता है कि साल भर तक तो विद्यार्थी इधर-उधर समय को जाया करते रहते हैं। मगर जैसे ही […]

शिवदयाल मिश्रा मोबाइल हाथों में आने के बाद उसके की बोर्ड से अंगुलियां ऐसे चिपकी, मानो मोबाइल माला ही बन गया। एक जमाना था तब भगवान में अटूट विश्वास रहता था। हर समय इंसान ईश्वर को याद रखता था। ईश्वर से डरता था कि कहीं कोई पाप न हो जाए। दुनिया में पाप और पुण्य दोनों बराबर-बराबर चलते हैं। हमारी संस्कृति में पाप और पुण्य के साथ भगवान के नाम का जप प्राथमिकता के साथ किया जाता है। कहीं भगवान की पाठ पूजा होती है तो वहां मंत्रों का जप जरूर होता है। एक समय था जब घर में भगवान […]

शिव दयाल मिश्रा भारतीय संस्कृति में ज्योतिष का अपना एक विशिष्ट स्थान है। भारतीय संस्कृति में हर कोई शुभ कार्य करने से पहले विद्वान पंडित एवं ज्योतिषाचार्यों से मुहूर्त निकलवाते रहे हैं और यह परम्परा आज भी कायम है। अपवाद स्वरूप कुछ लोगों ने इसे महत्व देना कम कर दिया है। ज्योतिष विद्या के द्वारा खगोलीय घटनाओं की भी सटीक जानकारी प्राप्त हो जाती है। इसका जीता-जागता उदाहरण है सूर्य और चन्द्र ग्रहण। मगर अब ज्योतिष का बाजारीकरण हो गया है। पहले मुहूर्त और अन्य जानकारियों के लिए यजमान पंडित (ज्योतिष का जानकार ब्राह्मण) के घर जाते थे। मगर अब […]

शिव दयाल मिश्रामकर संक्रांति पर्व पर पतंग उड़ाई जाती है अपनी खुशी के लिए। मगर यही खुशी अगर किसी के मातम में बदल जाए तो क्या कहा जाए। ऐसा ही होता है पतंग उड़ाने के काम में लिए जाने वाले चाइनीज मांझे से। अभी तो मकर संक्रांति में समय बाकी है मगर पतंग उड़ाने वालों का ‘वो काटाÓ की आवाजें बुलंदी पर है। वो काटा से तात्पर्य है पतंग की डोर कटने से। मगर जब पतंग की डोर के बजाए किसी के जीवन की डोर ही कट जाए। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है। मकर संक्रांति से पूर्व […]

शिव दयाल मिश्रानया साल सभी के लिए मंगलमय हो। आज बुधवार है, शुभ का दिन। वर्ष 2020 भी जागरूक जनता के हर पाठक के लिए शुभ का प्रतीक हो। वैसे हर नया साल कुछ नई उम्मीदें लेकर आता है और बहुत से लोग हर बार नववर्ष पर संकल्प करते हैं लेकिन इनमें से अधिकांश संकल्प टूट जाते हैं। इनका टूटना लाजमी है क्योंकि आधे-अधूरे मन से सिर्फ रस्म अदायगी के लिए किए गए वादे कभी पूरे नहीं होते। नववर्ष एक अच्छा अवसर होता है जिसमें अपनी बुरी आदतों को त्यागने और अपनी जीवनचर्या में सुधार के संकल्प किए जा सकते […]

शिवद याल मिश्रा बचपन से लेकर बुढ़ापे तक और जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त ईमानदारी का पाठ पढाया जाता है। मगर ईमानदारी है कि कहीं टिकने का नाम ही नहीं लेती। कहां ढूंढ़ें ईमानदारी को, पता नहीं कहां जा छिपी। ईमानदारी का ढोल तो चारों तरफ पीटा जाता है। मगर देखने में बेईमानी ही नजर आती है। ज्यादा दूर की बात नहीं करते। आप सब्जी और फल के ठेलों पर चले जाईये। वहां कई ठेले वाले पहले से ही फलों को थैली में पैक कर रखे हुए होते हैं। आप कितने ही फल छांट लो। होशियारी दिखालो। मगर, आप पैसे […]

शिवदयाल मिश्रा रामचरित मानस के रचियता संत तुलसीदासजी ने रामायण में लिखा है कि- हरित भूमि तृन संकुल, समुझ परे नहीं पंथ। बिनु पाखंड वाद ते, लुप्त होई सद्ग्रंथ।। तात्पर्य है कि बरसात के दिनों में सारी पृथ्वी हरित हो जाती है। चारों तरफ वनस्पति उग आती है और रास्ते दिखाई नहीं देते। इसी प्रकार जब झूंठ और पाखंड वाद-विवाद सामने आने लगते हैं तब सद्ग्रंथ लुप्त हो जाते हैं। इसी तरह ‘देसीÓ की बहुतायत में ‘असलीÓ को भूल गए हम। यह बात यहां इसलिए लिखनी पड़ रही है कि आजकल चारों तरफ किसी भी वस्तु की बहुतायत है जिसके […]

ऐसा सोचना भी बेमानी होगा कि देश में कोई दिन ऐसा भी हो जब हत्या, बलात्कार या अन्य जघन्य अपराध न हो। आए दिन दुष्कर्म और हत्या की वीभत्स मामले अखबारों की सुर्खियां बने रहते हैं। उनको पढ़-पढ़कर मन में क्रोध की अग्नि जलने लगती है। मगर आम नागरिक क्या करे। कैसे निजात पाए इन हैवान और दरिंदों से। आज के युग में मां, बहन और बहू बेटियों को घर में कैद तो नहीं रखा जा सकता। मगर भेडिय़ों से कैसे बचाएं उनको। थोथे नारे और स्लोगनों से तो कुछ होने से रहा। हमारे देश की लचर न्याय व्यवस्था और […]

हमें यह मानना पड़ेगा कि आज के युग में हमारे जीवन में विज्ञापनों का बड़ा महत्व है। ये विज्ञापन इलेक्ट्रोनिक मीडिया के हों चाहे प्रिंट मीडिया के। मगर हमारे जीवन में इनका अच्छा और बुरा प्रभाव निश्चित रूप से पड़ता है। कोई भी उत्पाद बाजार में आता है तो उसकी बिक्री के लिए विज्ञापनों का सहारा लिया जाता है। विज्ञापन कई प्रकार से किए जाते हैं। पैम्पलेट बांटकर, पोस्टरों के जरिए विज्ञापन हों या रिक्शे में लाउडस्पीकर के जरिए। होर्डिंग के जरिए या फिर भारी पैसे खर्च कर टीवी के जरिए या फिर किसी पत्र-पत्रिकाओं के जरिए। कभी कभी तो […]

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