मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि स्वयं के अनुसार कुछ नहीं हुआ या बात नहीं मानी गई तो उनमें मतभेद उभरने लगते हैं। फिर शुरू हो जाता है हर बात पर किच-किच होना। यही किच-किच आगे चलकर मतभेद से होते हुए मनभेद में बदल जाती है और फिर कभी नहीं बदलने वाला माहौल बन जाता है। शिव दयाल मिश्रा मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि स्वयं के अनुसार कुछ नहीं हुआ या बात नहीं मानी गई तो उनमें मतभेद उभरने लगते हैं। फिर शुरू हो जाता है हर बात पर किच-किच होना। यही किच-किच आगे चलकर मतभेद से होते हुए मनभेद में बदल जाती है और फिर कभी नहीं बदलने वाला माहौल बन जाता है। ये बात अक्सर परिवार के सदस्यों में शुरू होती है और इन्हीं बातों के पीछे घरों में अलगाव उत्पन्न हो जाता है। अगर […]

प्रजातंत्र में हर आदमी को अपनी बात कहने का हक दिया गया है। मगर इसका यह अर्थ तो कतई नहीं हो सकता कि आप जिद पर ही अड़ जाओ। कुछ झुको और कुछ झुकाओ। इसके बाद अपनी बात बनाओ। यह तो हुआ एक साफ-सुथरा लोकतंत्र। मगर यह राजनीति है ना, इसमें कोई किसी का सगा नहीं है। हालांकि कहते हैं कि राज धर्म से ही चलता है। शिव दयाल मिश्रा प्रजातंत्र में हर आदमी को अपनी बात कहने का हक दिया गया है। मगर इसका यह अर्थ तो कतई नहीं हो सकता कि आप जिद पर ही अड़ जाओ। कुछ झुको और कुछ झुकाओ। इसके बाद अपनी बात बनाओ। यह तो हुआ एक साफ-सुथरा लोकतंत्र। मगर यह राजनीति है ना, इसमें कोई किसी का सगा नहीं है। हालांकि कहते हैं कि राज धर्म से ही चलता है। अगर धर्म नहीं […]

शिव दयाल मिश्रा हमारे देश में सदियों से अस्पृश्यता चली आ रही है। अब वह मिटने लगी है। हालांकि हमारे शाों में कहीं भी अस्पृश्यता का उल्लेख नहीं मिला है जहां तक मैंने हमारे धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया है। भागवत की कथा में राजा हरिश्चन्द्र का वृतांत आता है जिसमें वह अपने वचन पालन के लिए डोम के घर बिक जाता है तथा उसकी नौकरी करता है। भगवान राम के राज्य में भी छुआछूत नहीं थी। और भी कई उदाहरण ऐसे हैं जिनसे यह साबित होता है कि हमारी संस्कृति में छुआछूत नहीं थी। मगर कालांतर में छुआछूत होने लगी और इसकी वजह से पीडि़त लोगों को काफी पीड़ा भी भोगनी पड़ी। मगर अब अस्पृश्यता धीरे-धीरे समापन की ओर अग्रसर हो रही है जो देश और समाज के लिए जरूरी है। अस्पृश्यता ने हमारे देश और समाज का बहुत […]

शिव दयाल मिश्राहमारे देश का संविधान नागरिकों को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार देता है। उसी संविधान में प्रदत्त अधिकारों के तहत देश में बड़े-बड़े आंदोलन हुए हैं। ऐसे आंदोलन लंबे समय तक भी चले हैं इनमें से कई आंदोलन शांतिपूर्वक चले और अपनी मांगें भी मनवाई। मगर कुछ ऐसे आंदोलन भी हुए जिनमें कुछ भी हाथ नहीं लगा, बल्कि कई लोगों की जान भी चली गई। कुछ विरोध प्रदर्शन होते हैं वे एक-दो दिन के लिए किए जाते हैं जिनका उद्देश्य सिर्फ सरकार तक अपनी बात पहुंचाने का होता है और सरकार उनकी बात पर विचार भी करती है। अगर उनकी मांगें वाकर्ई उचित होती हैं तो उन पर सरकार कार्यवाही भी करती है। मगर कुछ आंदोलन ऐसे हुए हैं जिन्होंने हिंसा का रूप ले लिया। जिनमें दोनों तरफ यानि आंदोलनकारी और सरकारी लोगों की जानें चली गई। […]

गरीब शब्द ही अपने आप में एक अभिशाप है। गरीब और गरीबी दोनों ही अपने आप में विरोधाभासी शब्द हैं। पहले यह शब्द मात्र एक ब्राह्मण के लिए इस्तेमाल होता था। हमेशा कथा और कहानियों में सुनने और बढऩे में आता है कि एक गरीब ब्राह्मण था। कभी दूसरी जाति के लिए गरीब शब्द का इस्तेमाल नहीं होता था। शिव दयाल मिश्रा गरीब शब्द ही अपने आप में एक अभिशाप है। गरीब और गरीबी दोनों ही अपने आप में विरोधाभासी शब्द हैं। पहले यह शब्द मात्र एक ब्राह्मण के लिए इस्तेमाल होता था। हमेशा कथा और कहानियों में सुनने और बढऩे में आता है कि एक गरीब ब्राह्मण था। कभी दूसरी जाति के लिए गरीब शब्द का इस्तेमाल नहीं होता था। गरीब ब्राह्मण सुदामा की कथा सर्वविदित है। एक तरफ गरीब ब्राह्मण सुदामा और दूसरी तरफ उनके मित्र द्वारका के […]

दुनिया साल-दर-साल एक अंक बढ़ाकर नए वर्ष में प्रवेश करती है। इसे कोई कहता है कि हमारे जीवन का एक वर्ष समाप्त हो गया और मैं कहता हूं कि हमारे जीवन में एक वर्ष और जुड़ गया। यानि कोई 50 वर्ष का है तो वह 51 वर्ष का हो गया और कोई कहता है उम्र अगर 100 वर्ष है तो एक घटकर 99 रह गई। अर्थात गिलास आधा खाली है या आधा भरा है। मतलब तो दोनों का एक ही है। खैर यह तो हुई गणना वाली बात। मगर सन् 2020 ने जीवन में बहुत सी बातें नई-पुरानी करने के साथ ही दुनिया की अर्थ व्यवस्था को दशकों पीछे धकेल दी। हमारे देश में तो 2020 शाहीन बाग आंदोलन से शुरू होकर सिंधु बार्डर पर जारी आंदोलन में ही गुजरता दिखाई दे रहा है। इस दौरान बहुत कुछ बदलाव भी […]

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शिव दयाल मिश्रा प्रारंभ में जयपुर को धर्मनगरी छोटी काशी के नाम से जाना जाता रहा है। क्योंकि यहां जगह-जगह वास्तु के हिसाब से धार्मिक स्थल बनाए गए थे। बाद में अंग्रेजों के जमाने में किसी अंग्रेज अफसर के जयपुर आगमन पर उसके स्वागत सत्कार में पूरे जयपुर को पिंक (गुलाबी) रंग से रंग दिया गया। तब से इसका नाम पिंकसिटी या गुलाबी नगर हो गया। सरकारी आदेश के अनुसार इसकी चार दीवारी में मकान के बाहर का हिस्सा यानि कि बाजारों से दिखने वाला हिस्सा गुलाबी (गेरुए) रंग से रंगा जाता है। सलीके से हुई बसावट के कारण पिंकसिटी का नाम दुनियाभर में मशहूर है। कोई भी विदेशी नागरिक भारत भ्रमण के लिए आता है तो वह जयपुर देखने जरूर आना चाहता है। जयपुर को देखने बिना वह अपनी भारत यात्रा को अधूरी ही मानता है। यहां के चौड़े-चौड़े […]

शिव दयाल मिश्रा लेखा जोखा रखने वाले लोग दिसम्बर का महीना शुरू होते ही वर्ष के बीते महीनों का हिसाब-किताब लगाना शुरू कर देते हैं कि इस वर्ष में क्या-क्या घटना घटी और क्या नफा-नुकसान और क्या-क्या नई परिस्थितियां सामने आई। अच्छी-बुरी घटनाओं पर नजर डाली जाती है। चालू वर्ष में विकास की चलती रफ्तार को कोरोना महामारी ने ऐसा अवरोध लगाया कि वह अभी तक अपनी रफ्तार नहीं पकड़ पाया है। रफ्तार पकडऩा तो दूर अभी तक दुनिया में इस बीमारी का ओर-छोर ही पता नहीं चल पा रहा है। कभी बीमारी अपना भयावह रूप दिखाती है तो कभी कम-ज्यादा हो जाती है। मगर इस महामारी से मुक्ति अभी दूर की कौड़ी नजर आ रही है। पहले लक्षणों के आधार पर इस बीमारी का पता चलता था। मगर अब तो बिना लक्षणों के भी यह बीमारी अपना मुंह बाए […]

शिव दयाल मिश्रा कोरोना महामारी का प्रकोप झेलते हुए लगभग 9 माह हो चुके हैं। मगर कोरोना अभी तक जाने का नाम ही नहीं ले रहा है। कभी कम तो कभी ज्यादा। कभी इस शहर में ज्यादा तो कभी उस शहर में ज्यादा। यानि कोरोना का जनता और सरकार के साथ लुकाछिपी का खेल चल रहा है। हालांकि हारना तो कोरोना को ही है। मगर सरकार द्वारा जितने भी प्रयास किए जा रहे हैं। वे पूरी तरह कारगर नहीं हो रहे हैं। सरकार द्वारा कोरोना के खिलाफ बचाव के तरीकों का प्रचार भी खूब किया जा रहा है। बड़े-बड़े होर्डिंग, पोस्टर और जगह-जगह सार्वजनिक स्थानों पर भी संकेतक (गोले) बनाकर प्रचार और समझाईश की जा रही है। मगर इन प्रचार सामग्री और संकेतक केवल दिखावे के लिए है। इस समय जितने कोरोना मरीजों की संख्या वृद्धि और मृत्यु हो रही […]

शिव दयाल मिश्रा जहां पति का उच्चारण होता है वहां अपने आप ही स्वामित्व और सर्वाधिकार सम्पन्न व्यक्तित्व का बोध हो जाता है। जैसे अधिपति, देवाधिपति, लोकाधिपति, गणाधिपति, तिरुपति आदि अनेक शब्दों के बाद प्रजापति, राज्याधिपति, लंकाधिपति, अयोध्यापति, मूर्खाधिपति, लखपति, खगपति और भी ऐसे बहुतेरे शब्द हैं। फिर आता है राष्ट्रपति, लोकपति, कुलपति, सभापति ऐसे अनेक शब्द हैं जिनका संबोधन पद को पति के साथ जोड़ कर किया जाता रहा है। पद का जहां तक सवाल है वह ी लिंग या पुलिंग नहीं होता है। राष्ट्रपति एक ऐसा शब्द है जिसके साथ सिर्फ राष्ट्र का जुड़ाव है। इस पद के साथ कोई अतिरिक्त ‘पतिÓ शब्द का जुड़ाव नहीं है। राष्ट्रपति के पद पर महिला हो या पुरुष। सिर्फ राष्ट्रपति शब्द का ही प्रयोग होता है। मगर कुछ ऐसे शब्द भी प्रचलन में आ गए हैं जहां महिला किसी पद को […]

शिव दयाल मिश्रा सरकार भ्रष्टाचार मिटाकर आमजन की भलाई के लिए अनेक तरह के उपाय करती है। कानून बनाती है। मगर जब तक आमजन के दिमाग में ईमानदारी नहीं आएगी, तब तक भ्रष्टाचार मिटाना आसान नहीं होगा। अब रसोई गैस के सिलेण्डर की सप्लाई को ही लीजिए। ऐसी क्या जरूरत महसूस होने लगी कि सिलेण्डर भी ओटीपी नंबर से कन्फर्म करने के बाद ही मिलेगा। कहीं तो गड़बड़ है। उसी गड़बड़ी को दूर करने के लिए शायद ओटीपी से गैस सप्लाई शुरू की जा रही है। मगर इससे लोगों को परेशानी भी उठानी पड़ रही है। ओटीपी गैस उपभोक्ता के उस नंबर पर आएगा जो कम्पनी में रजिस्टर करवा रखा है। अब अगर उपभोक्ता घर पर नहीं है और सिलेण्डर सप्लाई करने वाला घर पर आ गया तो बिना ओटीपी चैक किए कैसे मिलेगा सिलेण्डर। क्योंकि जिस मोबाइल पर ओटीपी […]

शिवदयाल मिश्राहमारी जीवनशैली में एक शब्द का बड़ा ही गहरा जुड़ाव है और वह शब्द है बाड़ाबंदी। हम देखते हैं कि गांवों में आम आदमी जीवन कृषि आधारित हुआ करता था (भले ही आज न हो, क्योंकि अब हर किसी के पास कृषि की जमीन ही उपलब्ध नहीं है) जब जीवन कृषि पर आधारित होगा तो उसके पास पशुधन भी होगा। पशुओं को घर या चौबारे में तो बांध नहीं सकते, इसलिए उनके लिए घर के पास ही एक बाड़ा बना दिया जाता था, जिसमें पशुओं के लिए चारा-पानी भी होता था। उनको खिलाने के लिए ठाण भी बने होते थे तथा गले में बांधने के लिए ठाण के पास ही गढ़े खूंटे के एक रस्सा भी बंधा होता था। जो पशुओं के गले में डाल दिया जाता था ताकि वह इधर उधर न जाए और न ही दूसरे के […]

शिव दयाल मिश्रा जीवन में हर आदमी सफल होना चाहता है। और सफलता प्राप्त करने के लिए श्रम और परिश्रम दोनों करता है। मगर किसी को सफलता मिल जाती है और किसी को नहीं। असफल लोग अपनी असफलता को छिपाने के लिए भाग्य को दोष देने लगते हैं और जो सफल हो जाते हैं वे अपनी मेहनत को श्रेय देने लग जाते हैं। मगर एक कहावत और सुनी जाती है कि हर पुरुष की सफलता के पीछे एक महिला का हाथ होता है। यानी कि पुरुष की सफलता में महिला की सहभागिता को जरूरी माना गया है। इसी प्रकार महिला की सफलता के लिए पुरुष को सहभागी माना गया है। लेकिन वर्तमान समय में ये दोनों बातें झुठलाई जा रही है। महिला की सफलता के लिए पुरुष का साथ और पुरुष की सफलता के लिए महिला का साथ होना जरूरी […]

शिव दयाल मिश्रा विप्र धेनु सुर संत हित, लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु, माया गुण गोपार।। जब ब्राह्मण, गाय, देवता और संतों पर अत्याचार होता है, तब इनकी रक्षा के लिए भगवान अपनी इच्छा से मनुष्य का शरीर धारण कर पृथ्वी पर अवतार लेते हैं। ऐसा हमारे धर्म ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। मगर पता नहीं भगवान के अवतार लेने की लक्ष्मण रेखा क्या है। यह तो भगवान ही जानें। लेकिन कुछ दिनों पूर्व सपोटरा के एक गांव में गरीब ब्राह्मण जो मंदिर में भगवान की सेवा-पूजा कर अपना गुजर-बसर कर रहा था। अपने परिवार का पेट पाल रहा था। उसे जिस भयावह और दर्दनाक तरीके से जिंदा जला दिया गया यह हमारे समाज पर एक कलंक है। लेकिन जिंदा जला देने जैसे अपराध की यह घटना कोई पहली घटना नहीं है। इसी क्षेत्र में कुछ वर्षों पहले […]

शिव दयाल मिश्रा एक के बाद एक घटते अपराधों को देखकर ऐसा लगने लगता है कि ये कभी रुकने वाले नहीं है। चाहे जितना भी कोई प्रयास कर ले। प्रयास करना कोई बुरी बात नहीं है। मगर जब प्रयास असफल हो तो फिर कठोर कार्रवाई करनी पड़ती है। मगर फांसी से बड़ी तो कोई कठोर कार्रवाई है नहीं। उसके बावजूद इन अपराधों में अंकुश लगने के बजाए बढ़ते ही जा रहे हैं। क्योंकि अभी कुछ महीनों पहले निर्भया मामले में एक साथ चार दरिंदों को फांसी पर लटकाया जा चुका है। और उससे पूर्व भी कितने फांसी पर चढ़ चुके हैं। मगर अपराधों में उत्तरोत्तर वृद्धि ही हो रही है। अपराधों को परोक्ष रूप से जो बच्चों के मस्तिष्क में पहुंचाया जा रहा है, उनके कर्ई माध्यम हैं। पहला फिल्मी, दूसरा टीवी पर चलने वाले अश्लील और बेतुके समाज को […]